'चक्रव्यूह' में फंसा भारतीय किसान

 'चक्रव्यूह' में फंसा भारतीय किसान

'चक्रव्यूह' में फंसा भारतीय किसान 

वर्तमान समय में हमारे राज्य मध्यप्रदेश एवं देश के अनेकों प्रदेशों में अति वर्षा के कारण फसलें नष्ट होने की कगार पर हैं और देश का अन्नदाता प्रकृति के समक्ष लाचार नज़र आ रहा है, देश के किसी ना किसी हिस्से में किसानों को आये दिन सड़कों पर आंदोलन करने के लिए उतरना पड़ रहा है, देश के ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग 59% आबादी खेती पर निर्भर है. इतने बड़े तबके की अशांति देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है. देश में लगातार हो रहे ये आंदोलन एक गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहे हैं...

विगत अनेकों वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में खेती की मौजूदा स्थिति को लेकर एक आक्रोश पनप रहा है. अगर समय रहते इसका समाधान न किया गया तो पूरा देश एक भयंकर आंदोलन की चपेट में आ सकता है. किसान की इस दुर्दशा के मूल कारणों की पड़ताल करना आवश्यक है. आखिर क्या वजह है कि आज किसान चहुं ओर से संकट में घिरा दिखाई दे रहा है और किसान की स्थिति चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु के समान नजर आ रही है...

कभी छत्तीसगढ़ के किसान सड़क पर टमाटर फेंक देते हैं, तो कभी कर्नाटक के अनेकों हिस्सों  में किसान प्याज सड़कों पर फेंकने पर मजबूर हो जाते हैं. हरियाणा के किसानों द्वारा आलू 90 पैसे प्रति किलो बेचने की खबर आती है. तो महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में फल, सब्जिया व दूध सड़कों पर बहाकर किसान आंदोलन करते हैं. आज हमारे देश में एक भी प्रदेश ऐसा नहीं है जहां से किसान की दुर्दशा की खबरें न आती हों. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में कुछ किसानों की कर्ज माफ़ी की घोषणा तात्कालिक राहत तो दे सकती है पर ये समाधान नहीं है. जब तक किसानों की वास्तविक मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं किया जाएगा, ये संकट बार-बार आता रहेगा...

किसानों के आज जो हालात हैं उसके लिए किसी एक सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा. पिछले 60 सालों में कांग्रेस ने सबसे अधिक सत्ता का सुख भोगा है, लेकिन देश के भले-चंगे किसान को बीमार बना के अस्पताल में भर्ती करवा दिया और मोदी सरकार ने उन बीमार किसानों को अस्पताल के वार्ड से आई.सी.यू. तक पहुंचा दिया है. किसानों को उस आईसीयू से कैसे निकाला जाए, यह सबसे बड़ी चुनौती है....

सरकार का कहना है कि वो किसान की आय दोगुनी करेगी, लेकिन पहले तो हम ये जानने की कोशिश करें कि आज किसान की आय क्या है. 1990 के आसपास से ये कृषि संकट बढ़ता जा रहा है, 2018 का जो सरकार का आर्थिक सर्वे है उसके अनुसार 17 राज्यों में किसानों की सालाना आय औसत बीस हज़ार रुपए है. इस हिसाब से किसान हर महीने क़रीब 1,700 से 1,800 रुपए में अपने परिवार को पाल रहा है...

मुझे नहीं समझ आता कि 1,700 रुपए में कोई परिवार अपना गुज़ारा कैसे कर सकता है. आज के वक़्त में यदि आप एक गाय भी पालते हैं तो इसके लिए आपको साल में 20,000 रुपये और महीने में 1,700 रुपये से अधिक रुपए खर्च करने पड़ते हैं, इतने कम में किसान परिवार कैसे जीवित रहता होगा यह तथ्य सोचनीय है...

एक अध्ययन के अनुसार 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपये प्रति क्विंटल था. 2015 में वो बढ़ कर 1450 रुपये प्रति क्विंटल हुआ और 2018 में वो 1840 रुपये प्रति क्विंटल हो गया, यदि 1970 से 2019 तक का वक़्त आप देखें तो आपको पता चलेगा कि इसमें 20 से 25 गुना बढ़ोतरी हुई है. सरकारी मुलाज़िम की सैलरी और डी.ए. को देखा तो पाया कि 1970 से 2019 तक में उनकी आय में 120 से 150 गुना बढ़ोतरी हुई है. इसी दौरान विद्यालय और विश्वविद्यालय के अध्यापकों की आय 150 से 170 गुना बढ़ी है. कंपनी के मध्यम स्तर के नौकरी पेशा कर्मचारियों की आय 300 गुना तक बढ़ी है...

अगर किसान की तरह सरकारी मुलाज़िमों की आय को 20 गुना पर रोक दिया गया होता तो आप सोच सकते हैं क्या हुआ होता, हम जानबूझकर किसानों को ग़रीब बनाए रख रहे हैं. हम उनका हक़ नहीं देना चाहते क्योंकि हमें शहरों में भी महंगाई को भी बढ़ने से रोकना है. इसका मतलब ये हुआ कि शहरों के लोगों को सस्ता अनाज देने के लिए गांवों में किसानों को समझौता करना पड़ रहा है. अगर पूरा हिसाब को देखें तो किसान के लिए अगर अनाज के समर्थन मूल्य को ना बढ़ाया गया तो उसे फ़ायदा नहीं मिलेगा. लेकिन हम ऐसा नहीं करते क्योंकि हमारे लिए किसान का आर्थिक विकास कोई मुद्दा ही नहीं हैं...

ये अच्छी बात है कि आज देश में किसानों के मुद्दों पर चर्चा तो हो रही है. प्रधानमंत्री जी ने जब कहा कि वो किसानों की आय को दोगुना करेंगे उन्होंने संकेत दिया कि वो किसान की आय से संबंधित मुद्दों पर ध्यान देना चाहते हैं. इससे पता चलता है कि इस बात की समझ अब बन रही है कि किसानों की आय के मुद्दों को सुलझाना बेहद ज़रूरी है और आय कम होने का कारण उत्पादन कम होना नहीं बल्कि दाम कम होना है. सरकारी मुलाज़िमों के लिए पे कमीशन की बात होती है तो किसानों के लिए भी किसी ऐसे कमीशन की बात की जानी चाहिए जो उसकी आय को निर्धारित कर सके.....

न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाले कमीशन से अलग या फिर इसी कमीशन के साथ एक अन्य कमीशन बनाया जाए, जो ये सुनिश्चित करे कि किसानों को कैसे महीने में 15 से 18 हज़ार रुपए मिल सके. अगर ऐसा किया जा सका तो ही हम सही मायनों में कह सकेंगे कि “सबका साथ-सबका विकास” में किसान भी शामिल हैं. जिस दिन साठ करोड़ किसानो के हाथ में पैसा होगा, ये जी.डी.पी. के आंकड़ों की लड़ाई और आर्थिक मंदी की चर्चा ही ख़त्म हो जाएगी.

लेखक: अभिनव मुखुटी राजा